स्वतंत्रता के बाद सबसे ज्यादा न समझा हुआ, अव्याख्यित पद अगर कोई रहा है तो वो है "सामान नागरिक संहिता" जिसका प्रचार राजनेता जनता को बरगलाने के लिए करते है और उनको संप्रदाय के आधार पर बांटकर अपना राजनीतिक हित साधते हैं। उन्होंने हिन्दू भाइयों के बीच एक गलत धारणा पैदा कर दी है कि मुसलमानों को मुस्लिम पर्सनल ला बोर्ड के द्वारा चार बीवियां रखने कि छूट मिली हुई है और जिससे मुसलमान जल्द ही हिन्दुओं को आबादी में पछाड़ देंगे और हिन्दू अल्पसंख्यक हो जायेंगे और बाबर की औलादे एक बार फिर भारत पर शासन करेंगी और वो भी अपनी संख्या के आधार पर...
प्रस्तुतकर्ता खुर्शीद अहमद सोमवार, 28 सितंबर 2009 8 टिप्पणियाँ
सज्जनों! यदि दिल चीर कर या आंसुओं को बहाकर देश के पर्वतों, वृक्षों और नदियों के ज़रिये हम आपको इस देश की कराह सुनवा सकते तो अवश्य इस कराह को आप तक पहुंचाते. यदि वृक्ष और पशु बोलते तो वे आपको बताते कि इस देश की अंतरात्मा घायल हो चुकी है. उसकी प्रतिष्ठा और ख्याति का बट्टा लगाया जा चूका है और पतन की ओर बढ़ने से वह अग्नि-परीक्षा के एक बड़े खतरे में पढ़ गया है. आज संतों, धर्मानिष्ठों, दार्शनिकों, लेखकों और आचार्यों के मैदान में आने, नफरत की आग बुझाने और प्रेम का दीप जलाने की आवश्यकता है. इस देश की नदियाँ, पर्वत और देश के कण-कण तक...
प्रस्तुतकर्ता खुर्शीद अहमद मंगलवार, 21 जुलाई 2009 1 टिप्पणियाँ

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